Govardhan Pooja leela in hindi भाग-1 ( गोवर्धन पूजा लीला )

 

गोवर्धन  पूजा लीला ( Govardhan Pooja leela in hindi)


आज आप इस आर्टिकल के माध्यम  गोवर्धन पूजा के बारे मै सम्पूर्ण जानकारी  बिस्तार से जानेगे,जिसमे इसके बारे मै हर एक चीज वर्णन किया गया है |जैसे श्री कृष्ण  ( Krishna )ने गोवर्धन (Govardhan ) पर्वत को पूजा और इंद्र अहंकार को दूर किया |

 

 सब बृजबासी बर्ष के कार्तिक महीने की चौदस को  नहाय धोय  केसर चन्दन से  चौक पुरांय   तरह - तरह  की मिठाई और पकवान धर, धूप दीप कर इन्द्र की  पूजा किया करे । यह रीति उनके यहाँ परम्परा से चली आती थी । एक दिन यही दिन आया तव नन्द जी के  घर वहुत सी  खानेकी सामग्री वनबाई  और ब्रजवासियों के घर  पर भी  भोजन की सामग्री तैयार हो रही थी । श्रीकृष्ण (Shree krishna ) ने  माँ से पूछा कि मैया  घर-घर  पकवान और  मिठाई बन रही है  आज  ऐसा क्या है  यशोदा (Yasoda) मैया बोलो कि, बेटा इस समय मुझे बात कहने की फुर्सत  नहीं तुम अपने पिता के पास जा पूछो तो वह बताय देंगे

 

यह सुन कन्हैया नन्द  के पास आये  कृष्ण (Krishna) ने कहा कि, पिताजी आज किस देवता की पूजा है पूजन जो  ऐसी धूम धाम से  जिनके लिये घर -घर पकवान और मिठाई तैयार हो रही है । वे कैसे मुक्तिवर के दाता हैं । उनका नाम और गुण कहो जो मेरे मन का सन्देह जाय । बाबा नन्द बोलै कि, पुत्र यह तूने अब तक नहीं समझा कि मेघो के पति हैं जो सुरपति तिनकी पूजा है जिनकी कृपासे इस संसार मेँ ऋद्धि मिलती है और तृण,अन्न होता हे वन-उपवन फलते-फूलते हैं, इससे सब जीव-ज़न्तु, पणु-पक्षी हर समय आनन्द मेँ रहते हैं । यह इन्द्रजाप की रीति हमारे यहॉ सदियों से चली आयी है, कुछ आज नईं नहीं निकली , नन्द जी से इतनी बात सुन श्री कृष्ण (Shree Krishan) बोल  हे पिता हमारे बडों ने जाने - अनजाने मै इन्द्र की पूजा की तो अब तुम जान -बूझकर धर्म का पन्थ छोड औघटबाट क्यों चलते हो, इन्द्र कै मानने से कुछ नहीं होता क्योकिं वह मुक्ति का दाता नहीं और उनसे ऋद्धि-सिद्धि किसने पाई है |

 

यह तुम ही बताओ  उसने किसे वर दिया  or  एक बात  यह भी  है । तप, यज्ञ करने से देवताओं ने अपना राजा बनाकर इन्द्रस्नासन दे रखा  है  और जो असुरों से बार-बार हारता है तब भाग कै कहीँ जा छिपकर अपने दिन काटता है  ऐसे कायर इन्द्र की पूजा नहीं कर सकते,  सुख - सम्पति धन, भाईं - बन्धु भी सब अपने धर्म-कर्म से मिलते हैं और आठ मास जो सूर्य जल सोखता है सोईं चार महीने बरसात है उसीसे तृण, जल, अन्न होता है और ब्रह्माने जो चार वर्ण बनाये हैं, ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र उन कै पीछे भी एक-एक काम लगा दिया कि ब्राह्मण तो वेदविद्या पढे, क्षत्रिय सबकी रक्षा करे' वैश्य खेती और शूद्र इन तीनो की सेबा करे |

 

 

पिता  हम वैश्य है' गाये' बढी  इनसे गोकुल हुआ  उसी से नाम गोप पड़ गया  हमारा यह कर्म है कि खेती-वाणिज्य करें और गौ'-ब्राह्मण काँ सेवा मेँ रहें वेद की आज्ञा है कि अपनी कुलरीति न छोडिये  जो लोग अपना धर्म तज और   अधर्म  पालते है,  जैसे कुल वधू हो पर पुरुष से प्रीति करें, इससे इन्द्र की पूजा छोड़ दीजै और वन-पर्वत्त की पूजा की जाये क्यो कि हम वनवासी है । हमारे राजा वे ही है जिनके राज्य मेँ हम सुख से रहते है ,उन्हें छोड़ और को पूजना हमेँ उचित नहीं, इससे अब पकवान मिठाई अत्र लै चलौ और गोवर्धन की पूजा करो । इतनी वात सुनते ही नन्द- उठ कर वहाँ  से गये जहॉ बडेबड़े गोप अघाई पर बैठे  थे  उन्होंने जाते ही कृष्ण (Krishna) की कही सब बातें उन्हें सुनाईं वे सुनते ही बोलें कि कृष्ण सच कहते हैं, तुम बालक जान उसकी बात मत टालो । भला तुम ही विचारो कि इन्द्र कौन है और हम उसे किस लिये मानते हैं जो पालता है उसकी पूजा जरुली है |यह वचन सुनते ही नन्दजी ने प्रसन्न हो गोपों में ढिढोरां फिरवा दिया कि कल सारे ब्रजवासी चल  कर गोवर्धन (Govardhan) की पूजा करंगे  जिसके घर  इंद्र  की पूजा के लिए मिठाई बनी है, इतना सुन कर सभी बृजबासी दूसरे दिन भोर मै एक साथ मिठाइयों के साथ गोवेर्धन (Govardhan) पर्वत पहुंचे

 

पर्वत को चारों ओर से झाड-बुहार जल छिड़क, घेवर, पापड, जलेबी, खुरमे, इमरती, फेनी, पेडे, बरफी, मटुकिया, सीरा, पूरी, कचौरी, सेब, पकौड़े आदि पकवान और भाँति - भाँति के भोजन व्यंजन साथ चुन-चुन रख दिये, वे इतने थे कि जिन से पर्वत छिप गया और ऊपर फूलों की माला पहनाय वर्ण-वर्ण  पाटम्बर तान दिये उस समय की शोभा बखानी नहीं जाती  गिरि ऐसा सुहावना लगता था कि जैसे किसी कौ गहने-कपडे पहनाय नखसिख श्रृंगार होय  नन्दजीने पुरोहित बुलाय सारे ग्वालो  को साथ लै रोली, अक्षत, पुष्प, चन्दन ,धूप , दीप, नैवेद्य, परान-सुपारी, दक्षिणा दे वेद की विधि से पूजा की, तब श्री कृष्ण (krishna) ने कहा कि, अब तुम शुद्ध मन से गिरिराज का ध्यान धरो तो वे आय दर्शन दे भोजन करें । कृष्ण से यों सुनंतेही नन्द-यशोदा समेत सब गोपी-गोप कर जोर नयन मूँद ध्यान लगाय खडे, उस काल हुए नंदलाल उधर तो अति मोह भारी दूसरी देह धर बड़े-बड़े हाथ-पॉव कर कमल नयन चन्द्रमुख हो मुकुट धरे, वनमाल गेरे, पीत बसन और रत्नजांड़ेत आभूषण पहिरे, मुँह पसारे चुपचाप पर्वत कै बीच निकलें और इधर आप ही ने दूसरे रूप को देख सबसे पुकार के कहा देखो, गिरिराज ने प्रगट हो दर्शन दिया जिनकी पूजा तुमने जी' लगाय करी है ।

 

इतना वचन सुना श्री  कृष्ण (Krishna) ने गिरिराज को दंडवत् की उनकी देखा-देखी सब गोपी-गोप प्रणाम कर आपस मेँ कहने लगे कि इस भाँति इन्द्र ने  कब दर्शन दिया था  हमने  उसकी पूजा की, और क्या जाने पुरखों ने भी ऐसे प्रत्यक्ष महान् देवता को छोड क्यों इन्द्र को ही माना, यह बात समझी नहीं आती यों सब बत्तराय रहे थे कि कृष्ण बोले अब देखते क्या हो  जो भोजन लाये हो सो खिलाओ इतना वचन सुनते ही गोप  षटरस भोजन थाल-परात्तों मेँ भर उठाय देने लगे और गोवर्धन हाथ वढाय-वढाय लै-लै भोजन करने  लगे, निदान जितनी सामग्री नन्द समेत ब्रजवासी ले गये थे सो खाईं तब सूरत  पर्वत मेँ समाई, इस भाँति अदृभुत लीला कर श्री कृष्ण ( Shree Krishna ) सब को साथ ले पर्वत की परिक्रमा दे दूसरे दिन गोवर्घन सै चल हँसते-खेलते वृन्दावन आये । तिस काल घर-घर मंगल  होने लगे और ग्वाल बाल सब गाय-बछडों  झूमने लगे |

 

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