Govardhan Pooja leela in hindi भाग-2 ( गोवर्धन पूजा लीला )
आइये जानते है की श्री कृष्ण ने मेघो से ब्रज रक्षा कैसे की |
जब सारे देवता इन्द्र पास गये वह पूछने लगा कि मुझे समझा कर कहो कि कल व्रज मे किसकी पूजा थी । इसी वीच नारदजी भी आय पहुँचे तो इन्द्र से कहने लगे किं सुनो महाराज, तुम्हें सब कोई मानते हैं पर एक ब्रजवासी नहीं मानते, क्योंकि नन्द के बेटा हुआ है । उसका सब करते हैं, उन्होंने तुम्हारी पूजा बंद करके सबसे पर्वत पुजबाया है । इतनी बात के सुनते ही इन्द्र क्रोध कर बोला कि, ब्रजवासियों को धन बढा इसी बीच मे उन्हें गर्व भी हुआ है । इतना
सुन के बाद उसने तुरंत सुरपति ने मैघपति को बुलाया भेजा और वह स्वयं ही डरता-काँपता आ हाथ जोड खडा
हुआ । उसे देखते ही इन्द्र स्नेह कर बोला कि, तुम अभी अपना दल साथ लै आओ और गोवर्धन
पर्वत -समेत ब्रजमण्डल पर बरस कर ऐसा बहाओ
कि कहीँ
गिरि का चिह्न और ब्रजवासियों का नाम न रह जाय । यह आज्ञा पाते मैघपति दण्डवत्
कर राजा से बिदा हुआ और उन्होंने अपने स्थान
पर आय बड़े-बड़े मेघों को बुलाय कै कहा कि सुनो, महाराज" की आज्ञा है कि तुम अभी
जाय ब्रजमण्डल को वर्षा से बहा दो । यह वचन सुन सब मेघपति कै साथ हो लिये । उन्होंने
आते ही ब्रजमण्डल को घेर लिया और गर्ज-गर्ज बडी-बडी बूंदोंसे लगा मूसलाधार जल बरसाने
और अँगुलौ से गिरि को बहाने । जब ऐसे चारो ओर से घन घोर घटा घिर आईं अखंड जल बरसने
लगा तब नंद-यशोदा समेत सब ब्रिज के गोपी- ग्बाल-बाल भय खाय भीगते थर थर काँपते श्रीकृष्ण
(Shree
krishna ) के पास पहुंच जाते है और कहने लगे हे कृष्ण (Krishan) इस महाप्रलय कै जल से कैसे बचेंगे।
तब तुम ने इन्द्र को पूजा की जगह पर्वत पुजवाया अब उनको ही बुलाइये
जो आकर हमारी रक्षा करें, नहीं तो क्षण
भरमे नगर समेत सब डूब मरते हँ । इतनी बात सुन और सबको भय मै देख श्रीकृष्ण (Shree
krishan ) बोले कि, तुम अपने मन मेँ किसी बात की चिंता मत करो । गिरिराज
अभी आय तुम्हारी रक्षा करते है" । ये कह गोवर्धन को तेज से तपाया और अग्नि सम करवाय और
हाथ की अँगुली पर उठा लिया । उस काल सब ब्रजवासी डेरों समेत अर उसके नीचे हुए और श्रीकृष्णजी
(Shree Krishan) को देख-देख अचरज कर आपस मेँ कहने
लगे कि…
उधर तो मेघपति अपना दल लिये क्रोध कर मूसलाधार जल बरसाता था, इधर पर्वत पर गिरते ही छनाक दे तबे की बून्द हो जाती । यह समाचार सुन इन्द्र भी कोप कर चढ आया और लगातार इस भाँति सात दिन बरसा, पर ब्रज़ मेँ हरि कृप्या से एक बूंद भी नहीं पडी । जब सब जल निबटा, तब मेघों ने हाथ जोढ़ कर कहा… हे नाथ ! जितना महाप्रलय का जल था सबका सब समाप्त हो चुका, अब क्या करें ? यह सुन इन्द्र ने अपने ज्ञानं-ध्यानसे विचारा कि आदिपुरुष ने अवतार लिया है नहीं तो किस में" इतनी सामर्थ है जो गिरि धारण कर ब्रज रक्षा करता। ऐसा सोच-समझ अछता पछता मेघों समेत इन्द्र अपने स्थान को गया और बादल उघड़े प्रकाश हुआ । तब सब ब्रजवासियों ने प्रसन्न हो कृष्णजी से कहा भगवन अब गिरि उतार धरिये, मेघ जाते रहे यह वचन सुनते ही कृष्ण ने पर्वत जहॉ का तहाँ रख दिया, उसदिन के बाद सभी बृजबासी की समझ आगया कृष्ण कोई साधारहण पुरुष नहीं है ,उस दिन सभी बृजबासी कृष्ण का लीलाओ का बखान करने लगे ||
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